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बलिया के बाग़ी तेवरों से कांपती थी अंग्रेजी हुकूमत : शहीद क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की जेल में बंद साथियों कराया आज़ाद ---- ऋचा वर्मा

 

स्वतंत्रविचार 24 (रिपोर्ट :-- हाजी वकील अहमद अंसारी)

बलिया के बाग़ी तेवरों से कांपती थी अंग्रेजी हुकूमत  : शहीद क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की जेल में बंद साथियों कराया आज़ाद  ---- ऋचा वर्मा
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रसड़ा (बलिया)। भारत माता को अंग्रेजी बुराइयों की जंजीरों से आजाद कराने में समूचे भारत के वीर सपूतों का अद्वितीय योगदान रहा है। भारत की आजादी का  इतिहास का जब भी अध्ययन किया जाएगा उसमें बलिया का नाम बड़े ही गर्व और गौरवपूर्ण तरीके से पढ़ा जाएगा क्योंकि बलिया ही वह जनपद है जहां की माटी की बगावती तेवर ने 15 अगस्त 1947 से पूर्व ही अंग्रेजी हुकूमत से लड़कर बलिया को आज़ाद कराया था। महिला पत्रकार व साहित्यिक लेखिका ऋचा वर्मा का कहना है कि बलिया को ऐसे ही नहीं बाग़ी कहा जाता है, बलिया की माटी में आज भी बुराइयों से लड़ने के लिए वही तेवर और जज्बा है। भारत की स्वतंत्रता के इतिहास में 19 अगस्त बलिया के लिए बहुत ही गौरवशाली दिन है। 1942 में इसी दिन बागी बलिया के सैकड़ों क्रांतिकारियों ने अपनी शहादत देकर ब्रिटानी हुकुमत से लोहा लेते हुए जिला कारागार का दरवाजा खोल अपने साथी क्रांतिकारियों को आज़ाद करा कर पर्चम लहराया था। आज़ादी के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन जब क्रांतिकारी शहीद चित्तू पांण्डेय डीएम की कुर्सी पर और राम दहिन ओझा एसपी बलिया की कुर्सी पर विराजमान होकर कुछ दिनों तक बलिया में शासन किया था और जिला जेल का फाटक खोल कर अपने क्रांतिकारी साथियों को आज़ाद कराया। इसी लिए  आज का दिन बलिया बलिदान दिवस के रूप में मना कर अपने क्रांतिकारी शहीदों को याद कर उन्हें  नमन करके गौरवान्वित महसूस करते हैं ।